हम क्या बदले

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उठे फिर आज प्रभात से पहले,
सोचकर बहुत कुछ रात से पहले।
तय कर के, पूरा दिनचर्या क्या होगा,
तय कर के मंज़िल, शुरआत से पहले।।

थामा वह समान जो रात बांध सोए थे,
कुछ बिखरी सी किताबें भी समेट ली सारी।
कुछ निहारे वो लम्हे जो किसी रोज़ खोए थे,
और अपनी शिकायतों की पोटली में लपेट ली सारी।

और निकले घर से कुछ अनजान खोजने को,
कहे सुने से कुछ अंजाम खोजने को।
सोचा क्या कुछ नया देख लेंगे,
दुनीयाँ की भट्टी में ,अपने भी सपने सेख लेंगे।।

सीखा भी बहुत कुछ उन नई गलियों से,
ठहाके कुछ अपने भी वहाँ दर्ज किए।
पाए भी वो मुकाम शायद जो ठान सोए थे,
कुछ पुरानी शिकाक़तों के भी अदा फ़र्ज़ किये।

आज जब लौटे हैं दोबारा तो फिर लेटे हैं,
अपने दिमाग में दोबारा से खोलकर पंजी।
गिन रहें हैं वह ख़ुशियाँ जो मुक्कमल कर बैठे हैं,
और वह सारे मंजर जो पाए बनकर पंछी।।

और अब सोच रहे हैं
“हम क्या बदले”


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About the author:

Soumya Thakur (Kavitactic)

Soumya Thakur is an avid reader of poetry and loves fearless writing and art. She is a law student willing to take creative risks and who’s passionate about writing. Also catch her fearless poetry on YouTube.

 

 

 


This post was made in collaboration with Kavitactic. Kavitactic strives to build a community of poets Chandigarh can call its own. They organise monthly events where they share, discuss and read a lot of poetry!

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